कई ग्राम पंचायतों की रिकवरी राशि पर बड़ा सवाल
वसूली हुई पंचायत से, लेकिन सरकारी खजाने तक पहुंचने में लग गया लंबा वक्त
शहडोल। ग्राम विकास योजनाओं और निर्माण कार्यों में अनियमितताओं की शिकायतों की जांच के बाद जिला पंचायत कोर्ट द्वारा संबंधित ग्राम पंचायतों के सरपंच एवं सचिवों से रिकवरी के आदेश दिए गए थे। पंचायतों से राशि की वसूली भी कर ली गई, लेकिन आरोप है कि वसूली गई शासकीय राशि लंबे समय तक सरकारी खाते में जमा नहीं हुई। अब इस पूरे मामले ने जिला पंचायत की वित्तीय व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला अनेक ग्राम पंचायतों का
बताया जा रहा है कि मामला करीब डेढ दर्जन ग्राम पंचायतों से संबंधित रिकवरी राशि का है। आरोप है कि जिला पंचायत में कार्यरत डाटा एसबीएम के लेखापाल अंशुल जैन द्वारा राशि रसीद काटी गई, जबकि राशि को बैंक अथवा शासकीय कोष में जमा कराने की प्रक्रिया में अंशुल जैन की भूमिका संदिग्ध रही। आरोप यह भी है कि कैशियर शैलेश जैन ने अंशुल के कहने पर कैश रजिस्टर में उक्त रिकवरी दर्ज तो कर ली लेकिन अंशुल जैन ने राशि कोष में जमा किया नहीं इस पर ध्यान नहीं दिया और इसी का फायदा अंशुल जैन ने कथित तौर पर उठाया जिस पर अब तक कोई सख्त कार्यवाही नहीं हो सकती है। राशि लंबे समय तक सरकारी खाते में जमा नहीं हुई और उसका कथित तौर पर निजी उपयोग किया गया।
क्या कर रहे थे जिम्मेदार
आरोपित किया गया है कि संबंधित कर्मचारियों द्वारा जिला पंचायत कार्यालय में बैठकर रिकवरी वसूली की राशि की रसीद तो काटी गई लेकिन रकम कोष में जमा नहीं हुई जो गंभीर वित्तीय अधिनियमितता का स्पष्ट प्रमाण है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि पंचायतों से वसूली गई सरकारी रकम यदि समय पर शासकीय कोष में जमा नहीं हुई तो इसकी निगरानी किस स्तर पर हो रही थी? रसीद कटने के बाद राशि सरकारी खाते तक पहुंची या नहीं, इसकी जांच के लिए जिम्मेदार व्यवस्था इतने लंबे समय तक कैसे निष्क्रिय रही?
सिर्फ रिकवरी नाकाफी
बताया जाता है कि मामला जिला पंचायत के सीईओ शिवम प्रजापति के संज्ञान में आने के बाद कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की बात सामने आ रही है। इसके बाद कथित रूप से संबंधित राशि को वापस सरकारी खजाने में जमा कराने की कवायद शुरू हुई और अब राशि किस्तों में खाते से निकालकर शासकीय खाते में जमा किए जाने की जानकारी सामने आ रही है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या सिर्फ राशि की रिकवरी ही पर्याप्त है?
अपराधिक प्रकरण क्यों नहीं?
जिला पंचायत कार्यालय से जुड़े सूत्रों एवं जानकारी लोगों के बीच यह चर्चा सरगम और सवाल उठाए जा रहे हैं कि यदि जांच में शासकीय अमानत राशि के गबन, हेराफेरी अथवा निजी उपयोग की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार आपराधिक एवं विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं की गई? आखिर सरकारी धन को लंबे समय तक रोककर रखने की जिम्मेदारी किसकी थी और निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका क्या रही?
कौन है जिम्मेदार
16 ग्राम पंचायतों की रिकवरी राशि से जुड़े इस मामले में अब लोगों की नजर जांच की अगली कार्रवाई पर है। सवाल सिर्फ पैसा वापस आने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का भी है कि सरकारी राशि समय पर जमा क्यों नहीं हुई, कितने समय तक बाहर रही और इसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? सरकारी अमानत की रकम अगर निजी खाते के इस्तेमाल तक पहुंची, तो सिर्फ रिकवरी या फिर जिम्मेदारी भी तय होगी?

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