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उपाध्याय लिख रहा नया भ्रष्टाचार का नया अध्याय

 बुढार जनपद के सीईओ ने दिया ' एकछत्र राज ' का वरदान 

बलभद्रपुर पंचायत में सचिव को वनवास 

जीआरएस संभाल रहे निरंकुश राज

पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल





" बलभद्रपुर शहडोल जिले की एक ऐसी ग्राम पंचायत है जहां कोई विधान, संविधान, शासकीय आदेश या निर्देश कुछ भी लागू नहीं होता है वहां अगर लागू है तो सिर्फ जनपद सीईओ का कथित मौखिक आदेश। इसी मौखिक आदेश ने ग्राम रोजगार सहायक को बलभद्रपुर ग्राम पंचायत का बेताज बादशाह बना दिया है। सूत्रों की माने तो राकेश उपाध्याय नामक इस जीआरएस ने पिछले 5-6 वर्षों में शासकीय योजनाओं एवं निर्माण कार्यों में व्यापक अनियमितताएं बरतते हुए पंचायत राज में भ्रष्टाचार का नया अध्याय लिख डाला और जिले के अधिकारियों को इसकी भनक भी नहीं लगी शायद यही वजह है कि एक अल्प वेतन भोगी लक्जरी वाहन में ड्यूटी करने जाता है। "

(Anil Dwivedi 7000295641)

शहडोल। जिले के जनपद पंचायत बुढार अंतर्गत ग्राम पंचायत बलभद्रपुर की प्रशासनिक कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा का विषय बनी हुई है। पिछले लगभग पांच से छह वर्षों से ग्राम रोजगार सहायक (जीआरएस) राकेश उपाध्याय पंचायत के वित्तीय एवं सचिवीय कार्यों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए हुए हैं, जबकि पंचायत में नियमित रूप से पंचायत सचिव केपी सिंह पदस्थ हैं। स्थानीय स्तर पर इस व्यवस्था को लेकर अनेक सवाल उठ रहे हैं और लोग यह जानना चाहते हैं कि जब पंचायत में नियमित सचिव उपलब्ध हैं तो फिर वित्तीय दायित्व किसी अन्य कर्मचारी के पास क्यों बना हुआ है।

अगल-बगल भी दखल

जानकारी के अनुसार बलभद्रपुर ग्राम पंचायत में सचिव के रूप में केपी सिंह की विधिवत पदस्थापना है। बताया जाता है कि उनके विरुद्ध न तो कोई विभागीय जांच लंबित है, न मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की धारा 92 के अंतर्गत कोई कार्रवाई चल रही है और न ही ऐसा कोई प्रशासनिक आदेश सार्वजनिक रूप से सामने आया है, जिसके आधार पर उन्हें वित्तीय प्रभार से अलग रखा जाना आवश्यक हो। इसके बावजूद पंचायत के वित्तीय संचालन और अनेक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों का दायित्व लंबे समय से जीआरएस राकेश उपाध्याय द्वारा निभाया जा रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थिति केवल बलभद्रपुर तक सीमित नहीं है। आरोप है कि समीपवर्ती ग्राम पंचायतों के कार्यों में भी राकेश उपाध्याय का प्रभाव लगातार बना हुआ है। चर्चा यह भी है कि एक वित्तीय प्रभार के माध्यम से लगभग 2-2 पंचायतों से जुड़े कार्यों में उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप वर्षों से जारी है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि एक ग्राम रोजगार सहायक की भूमिका आखिर किस प्रशासनिक आदेश के तहत इतनी विस्तृत हो गई।

सचिव को वनवास 

पंचायत व्यवस्था में सचिव की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पंचायत के अभिलेखों का संधारण, वित्तीय लेनदेन, शासकीय योजनाओं का संचालन, भुगतान प्रक्रिया, प्रशासनिक समन्वय तथा अन्य अनेक वैधानिक दायित्व सचिव के माध्यम से संपादित किए जाते हैं। ऐसे में यदि नियमित सचिव की उपस्थिति के बावजूद कोई अन्य कर्मचारी लंबे समय तक इन दायित्वों का निर्वहन करता रहे तो पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सूत्रों के अनुसार पंचायत सचिव केपी सिंह कई वर्षों से स्वयं को वास्तविक जिम्मेदारियों से वंचित महसूस कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि सचिव पद पर नियुक्त होने के बावजूद उन्हें अपेक्षित अधिकार और जिम्मेदारियां नहीं मिल पा रही हैं। कई लोगों का कहना है कि वे केवल नाममात्र के सचिव बनकर रह गए हैं, जबकि वास्तविक संचालन किसी अन्य के हाथों में है। यदि यह स्थिति सही है तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि नियमित रूप से नियुक्त अधिकारियों और कर्मचारियों के अधिकारों से भी जुड़ा गंभीर विषय है।

सीईओ का संरक्षण

चर्चाओं में यह आरोप भी प्रमुखता से सामने आ रहा है कि जीआरएस राकेश उपाध्याय को जनपद पंचायत बुढार के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) का विशेष संरक्षण प्राप्त है। इसी कारण उनके पास लगातार सचिवीय और वित्तीय जिम्मेदारियां बनी हुई हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, यदि इस प्रकार के निर्णय लिए गए हैं तो संबंधित प्रशासनिक आदेश सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सके और अनावश्यक विवाद समाप्त हो।

नियमों की अनदेखी 

 जानकार सूत्रों का मानना है कि पंचायत प्रशासन में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रत्येक वित्तीय निर्णय स्पष्ट आदेशों और नियमों के अनुरूप होना चाहिए। यदि किसी नियमित सचिव से वित्तीय प्रभार वापस लिया जाता है तो उसके पीछे उचित कारण, सक्षम अधिकारी का आदेश तथा संबंधित अभिलेख उपलब्ध होना आवश्यक है। अन्यथा ऐसी व्यवस्थाएं भविष्य में प्रशासनिक विवादों और जवाबदेही के प्रश्नों को जन्म दे सकती हैं।

सचिव की उपेक्षा क्यों 

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि सचिव केपी सिंह के विरुद्ध कोई गंभीर शिकायत या विभागीय कार्रवाई नहीं है तो उन्हें उनका वैधानिक वित्तीय प्रभार सौंपा जाना चाहिए। वहीं यदि किसी कारणवश ऐसा नहीं किया गया है तो प्रशासन को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि इसके पीछे क्या कारण हैं और किस नियम के तहत यह व्यवस्था लागू की गई है।

इस पूरे मामले को लेकर जनपद पंचायत बुढार के प्रशासन की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में है। पंचायतों में सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जनपद प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि किसी पंचायत में वर्षों से असामान्य व्यवस्था संचालित हो रही है तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक मानी जा रही है।

कार्यवाही आवश्यक 

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला एवं जनपद स्तर के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेते हैं या नहीं। यदि आरोप तथ्यात्मक रूप से सही पाए जाते हैं तो संबंधित अभिलेखों, वित्तीय प्रभार आदेशों तथा सचिवीय दायित्वों की विस्तृत जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जा सकती है। इससे न केवल पंचायत प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि भविष्य में ऐसी व्यवस्थाओं पर भी स्पष्टता आएगी।

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