आईसीआईसीआई बैंक घोटाले के आरोपी ने जीएनएस फ्रॉड में निभाई मुख्य भूमिका
धोखाधड़ी के मुकदमे के बावजूद नगर पालिका उपाध्यक्ष हनुमान खंडेलवाल की इमारत में खोली महाठगी की दुकान
करोड़ो की ठगी मामले में शासन-प्रशासन की खामोशी पर उठे तीखे सवाल!
" देशी कहावत ' मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन ' को अक्षरशः चरितार्थ कर गया सुखनन्दन। सैकड़ों लोगों की जिंदगी भर की कमाई जो 3 से 5 सौ करोड़ के बीच होगी, सतरंगी सपने दिखा कर ले उड़ने वाले कथित जीएनएस फायनेंस कंपनी के कर्ताधर्ताओं पर तो पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर लिया लेकिन जादुई कमाई की जमीन यानी किराये का भवन उपलब्ध कराकर ( वह भी यह जानते हुए कि किरायेदार पूर्व से ही कथित ठगी या धोखाधड़ी का आरोपी है और प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन है ) अवैध कमाई और ठगी के कारोबार में सहभागिता निभाने वाले भवन मालिक को यूं ही दरकिनार कर दिया जाना कई सवालों को जन्म देता है। "
शहडोल। कोयलांचल में गरीब जनता के खून-पसीने की कमाई पर डाका डालने वाले गिरोहों और उनके आकाओं का पर्दाफाश होते ही बुढ़ार से लेकर धनपुरी तक के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। आईसीआईसीआई बैंक के नाम पर दर्जनों बेबस मजदूरों, महिलाओं और सीधे-सादे ग्रामीणों की जिंदगी भर की जमापूंजी डकारने वाला कुख्यात 'नटवरलाल' सुखनंदन यादव (निवासी बुढ़ार) एक बार फिर शहर के बीचों-बीच जीएनएस मोतीलाल ओसवाल के नाम पर महाठगी का नया जाल बिछाकर सामने आया है।
लेकिन इस पूरे काले कारोबार का सबसे वीभत्स और यक्ष प्रश्न यह है कि जिस सुखनंदन पर संगीन धाराओं में पुलिस केस दर्ज हो, जो सलाखों के पीछे होना चाहिए था, वह खुलेआम शहर के सबसे प्राइम लोकेशन पर फर्जीवाड़े का नया साम्राज्य खड़ा करने की जुर्रत कैसे कर बैठा? इस महाठग की पीठ पर आखिर किस रसूखदार 'सफेदपोश आका' का हाथ था?
नपा उपाध्यक्ष की इमारत बनी ठगी का अड्डा
स्थानीय सूत्रों और उजागर हुए पुख्ता तथ्यों ने इस पूरे फर्जीवाड़े में सत्ता और रसूख के गठजोड़ की पोल खोलकर रख दी है। सुखनंदन यादव को जीएनएस के जरिये मोतीलाल ओसवाल का मायाजाल फैलाने के लिए जो अड्डा मुहैया कराया गया, वह शहर के बीचों-बीच बैंक ऑफ बड़ौदा के ठीक ऊपर संचालित हो रहा था।
सब जानते हैं कि जिस इमारत में बैंक ऑफ बड़ौदा चल रहा है और जिसके ऊपर जीएनएस मोतीलाल ओसवाल का दफ्तर सजाकर जनता को लूटा जा रहा था, उस पूरी आलीशान इमारत के मालिक खुद नगर पालिका उपाध्यक्ष हनुमान प्रसाद खंडेलवाल हैं। अब इलाके की पीड़ित जनता और जागरूक नागरिक हुक्मरानों से सीधे और तीखे सवाल पूछ रहे हैं: क्या रसूख की आड़ में जानबूझकर आंखें मूंदी गईं? जब सुखनंदन यादव पर आईसीआईसीआई बैंक एजेंट बनकर लाखों रुपये डकारने की एफआईआर धनपुरी थाने में पहले से दर्ज थी, तो नगर पालिका उपाध्यक्ष ने किस लालच या दवाब में आकर इस दागी ठग को अपनी ही इमारत में कार्यालय खोलने का मंच दिया? प्रशासनिक वेरिफिकेशन को कचरे के डिब्बे में किसने फेंका? किसी भी व्यापारिक दफ्तर या किराएदार को पनाह देने से पहले अनिवार्य पुलिस वेरिफिकेशन (Verification) की धज्जियां क्यों उड़ाई गईं? क्या रसूखदारों के लिए कानून के नियम अलग हैं।एक घोटाले से बचकर सुखनंदन का तुरंत दूसरा बड़ा महाफ्रॉड रच देना इस बात का साफ सबूत है कि इस ठग के पीछे स्थानीय सफेदपोशों, राजनीतिक आकाओं और प्रशासनिक शह का पूरा का पूरा 'सिंडिकेट' ढाल बनकर खड़ा था!
आईसीआईसीआई बैंक घोटाले से जीएनएस तक
गौरतलब है कि पूर्व में भी सुखनंदन यादव और उसके गुर्गों (कमलाकांत आदि) ने खुद को आईसीआईसीआई बैंक का फर्जी नुमाइंदा बताकर इलाके के अनपढ़ मजदूरों और ग्रामीणों को एफडी व बचत का झांसा देकर लाखों रुपये की चपत लगाई थी। जब पीड़ितों का गुस्सा फूटा, तब कहीं जाकर धनपुरी थाने में धारा 420, 409, 120B जैसे गंभीर आपराधिक मामलों में केस दर्ज हुआ था। लेकिन कानून के शिकंजे से बचते-बचाते सुखनंदन ने बुढ़ार के मुख्य बाजार को ही अपनी नई 'शिकारगाह' बनाया और जीएनएस मोतीलाल ओसवाल के नाम पर जनता को दोबारा लूटने का चक्रव्यूह रच दिया। आज जब इस फ्रॉड की परतें उधड़ रही हैं, तो उंगलियां सीधे उन ताकतवर चेहरों पर उठ रही हैं जिन्होंने इस महाठग को शहर के बीचों-बीच दफ्तर सौंपकर शरीफ बनने का नकाब पहनाया था।
आकाओं पर हो सीधी स्ट्राइक
ठगी का शिकार हुई बेबस जनता और आक्रोशित नागरिकों का साफ़ कहना है कि पुलिस और जांच एजेंसियां अब सिर्फ सुखनंदन जैसे मोहरों की गिरफ्तारी तक सीमित रहकर खानापूर्ति न करें। जांच की आंच उन 'सफेदपोश आकाओं' तक पहुंचनी ही चाहिए, जिन्होंने इस अपराध को सींचा है: नगर पालिका उपाध्यक्ष हनुमान प्रसाद खंडेलवाल द्वारा एक नामजद 420 के आरोपी को अपनी ही इमारत में दफ्तर देने के पीछे की असल डील की परतें खोली जाएं! बिना पुलिस वेरिफिकेशन के इतने बड़े वित्तीय जालसाज को शरण देने के मामले में जवाबदेही तय की जाए। इस पूरे फर्जीवाड़े में पर्दे के पीछे से मलाई काटने वाले हर राजनीतिक और प्रशासनिक रसूखदार पर सह-अभियुक्त के तहत मामला दर्ज किया जाए!
जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि महाठग और उसको संरक्षण देने वाले पूरे 'सिंडिकेट' पर पुलिस प्रशासन की सीधी और कठोरतम कानूनी कार्रवाई देखना चाहती है!

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