बुढार-धनपुरी में 500 करोड़ की कथित ठगी का मामला
संरक्षण देने वालों पर भी कब चलेगा कानून का शिकंजा?
जीएनएस फाइनेंशियल कंपनी मामले में उठे सवाल
पीड़ितों ने निष्पक्ष और व्यापक जांच की उठाई मांग
शहडोल। अयोध्या के श्रीराम मंदिर से दान की करोड़ों रुपये की राशि चोरी होने और अमरकंटक स्थित मां नर्मदा मंदिर से सोने-चांदी के आभूषण गायब होने जैसी घटनाओं ने देशभर में हलचल मचा दी। लेकिन शहडोल जिले के बुढार–धनपुरी क्षेत्र में कथित तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये की निवेश ठगी का मामला भी कम गंभीर नहीं माना जा रहा। हजारों लोगों की गाढ़ी कमाई दांव पर लगने के बावजूद पीड़ितों का आरोप है कि जांच की रफ्तार बेहद धीमी है और कई अहम पहलुओं को अब तक पूरी गंभीरता से नहीं परखा गया है।
जीएनएस फाइनेंशियल कंपनी के विरुद्ध दर्ज एफआईआर के अनुसार लगभग 1200 निवेशकों से धन एकत्र किए जाने का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कंपनी के संचालकों सुखनंदन यादव, सरोज यादव और मुकेश यादव ने निवेश के नाम पर लोगों से बड़ी रकम जुटाई और बाद में फरार हो गए। विभिन्न शिकायतों में कथित ठगी की राशि 250 करोड़ रुपये से लेकर 300–500 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है। वास्तविक राशि का निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही संभव होगा।
संरक्षण देने वालों की भी हो जांच
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि किसी कंपनी ने वर्षों तक एक भवन से बड़े पैमाने पर कारोबार किया तो क्या केवल संचालकों की ही जिम्मेदारी तय होगी या उन लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी जिन्होंने कंपनी को संचालन के लिए आधार उपलब्ध कराया?
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस प्रकार अवैध गतिविधियों में प्रयुक्त वाहन, गोदाम या भवन के संबंध में भी जांच की जाती है, उसी प्रकार इस मामले में भी यह पता लगाया जाना चाहिए कि कंपनी को किराए पर भवन उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति की भूमिका क्या थी। क्या उन्हें कंपनी की गतिविधियों की जानकारी थी, क्या उन्होंने केवल मकान किराए पर दिया था या जांच में कोई अन्य तथ्य सामने आते हैं—यह तय करना जांच एजेंसियों का काम है।
मकान मालिक' की कोई जिम्मेदारी नहीं?
इस पूरे महाघोटाले में सबसे तीखा और गंभीर सवाल उन 'नेपथ्य के किरदारों' पर उठ रहा है, जिन्होंने इस अवैध धंधे को फलने-फूलने के लिए अपनी जमीन और साख उधार दी थी। कानून का सीधा सिद्धांत है यदि किसी अवैध गोदाम, वाहन या भवन से कोई गैरकानूनी धंधा संचालित होता है, तो सबसे पहले उसके मालिक को शिकंजे में लिया जाता है। तो फिर जीएनएस कंपनी के मामले में यह ढिलाई क्यों? स्थानीय गलियारों और पीड़ित जनता के बीच यह बात पूरी ताकत से गूंज रही है कि जिस आलीशान भवन से इस ठगी के साम्राज्य को चलाया जा रहा था, वह धनपुरी नगरपालिका परिषद के उपाध्यक्ष और रसूखदार कांग्रेस नेता हनुमान खंडेलवाल का है। क्या एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि को यह भनक तक नहीं थी कि उनके भवन में करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं? क्या यह सिर्फ एक साधारण 'मकान-किराएदार' का रिश्ता था, या इसके पीछे संरक्षण और हिस्सेदारी का कोई गहरा खेल है? जनता मांग कर रही है कि जांच की सुई जब तक इस रसूखदार चौखट तक नहीं पहुंचेगी, तब तक इंसाफ की उम्मीद बेमानी है। (हालांकि, जब तक कोई सक्षम एजेंसी या अदालत इस पर मुहर नहीं लगाती, तब तक निष्पक्षता के नाते उनका पक्ष भी सामने आना जरूरी है—लेकिन जांच से परहेज क्यों?
प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
पीड़ित निवेशकों का आरोप है कि कंपनी के खिलाफ शिकायतें पहले भी सामने आई थीं। उनका कहना है कि यदि शुरुआती स्तर पर ही प्रभावी जांच और निगरानी होती तो संभवतः इतना बड़ा आर्थिक नुकसान नहीं होता। इसी कारण स्थानीय पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की भी स्वतंत्र जांच होना आवश्यक है।
किसकी कमाई डूबी?
इस कथित ठगी में प्रभावित लोगों में किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी, नौकरीपेशा कर्मचारी, पेंशनभोगी और महिलाएं शामिल बताई जा रही हैं। कई लोगों ने जमीन बेचकर, सेवानिवृत्ति की राशि निकालकर या वर्षों की बचत निवेश की थी। अब वे अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने के लिए कार्यालयों और थानों के चक्कर काट रहे हैं।
जांच का दायरा बढ़ाने की मांग
पीड़ितों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि जांच केवल कंपनी संचालकों तक सीमित न रहे, बल्कि कंपनी के वित्तीय लेन-देन, संपत्तियों, बैंक खातों, सहयोगियों, एजेंटों तथा यदि साक्ष्य मिलें तो संरक्षण देने वाले किसी भी व्यक्ति की भूमिका की भी गहन जांच की जाए। साथ ही निवेशकों की राशि की रिकवरी के लिए संपत्ति कुर्की सहित सभी कानूनी विकल्पों पर कार्रवाई की जाए।
सबकी निगाहें जांच एजेंसियों पर
बुढार–धनपुरी का यह मामला अब केवल एक कथित वित्तीय घोटाले का नहीं, बल्कि आम नागरिकों के विश्वास, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन की परीक्षा बन गया है। पीड़ितों का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष, व्यापक और पारदर्शी हुई तो न केवल दोषियों की जवाबदेही तय होगी बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर भी अंकुश लग सकेगा।
फिलहाल बुढार–धनपुरी की यह कथित फाइनेंस कंपनी ठगी केवल आर्थिक अपराध का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह आम लोगों के विश्वास, प्रशासनिक सतर्कता और वित्तीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन चुका है। अब सबकी निगाहें जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि वे इस बहुचर्चित मामले की तह तक पहुंचकर दोषियों की जिम्मेदारी तय करती हैं या नहीं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच एजेंसियां इस बहुचर्चित मामले में केवल मुख्य आरोपियों तक सीमित रहती हैं या उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन सभी पहलुओं की भी जांच करती हैं जिनकी मांग पीड़ित और स्थानीय नागरिक लगातार उठा रहे हैं।


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