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स्टेनो का भौकाल, आपरेटर मालामाल

 पीवीटीजी की छीनी रोजी अब जारी है मनमौजी

दफन हैं कई बड़े राज, सच सामने आएगा कल हो या आज


" विशेष पिछड़ी जनजाति कोटे की नौकरी जुगाड़ से प्राप्त करने के बाद संविदा आधार पर डाटा एंट्री ऑपरेटर बना राजकुमार अब स्टेनो की कुर्सी क्या पाया जिला पंचायत का युवराज ही बन गया। सीईओ के सामने एसी रूम में बैठकर सीईओ के अधिकारों का भरपूर इस्तेमाल कर रहा है। शहडोल जिला पंचायत में अब वही होता है जो स्टेनो कहे, भले ही अवैध वसूली सहित कई बड़े-छोटे कांड में नाम आया हो लेकिन ना भौकाल कम हुआ और न ही ऊपर-नीचे से मिलने वाला माल....। लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि कार्यालयों में वातानुकूल कक्ष की पात्रता किसे है, यदि डीईओ (डाटा इंट्री आपरेटर) को है तो कार्यालय के अन्य अधिकारी-कर्मचारियों ने कौन सा किसी का खेत काट लिया कि वह इस सुविधा से वंचित रखे जा रहे हैं?"

शहडोल। जिला पंचायत को पता नहीं किसकी नजर लग गई है। नित नये खुलासे, नित नये बवाल और सब पर भारी राजकुमार का भौकाल। लगातार सुर्खियों में रहने वाले जिला पंचायत कार्यालय से जुड़ी खबरें जिले के लोगों को जब तब आश्चर्य चकित करती रही हैं। फर्जी नियुक्ति धारी के रूप में चर्चित संविदा कर्मचारी की गतिविधियों पर लगाम लगने का समय अब दूर नहीं रह गया है। अपुष्ट सूत्रों से मिली खबरों पर यदि थोड़ा भी यकीन करें तो यह माना जा सकता है कि बहुत जल्दी यह मामला कोर्ट में दाखिल हो रहा है और तब किसी सल्तनत के युवराज का सुख भोग रहे राजकुमार के पैरों तले जमीन खिसकने से शायद ही कोई रोक पाएगा।


क्या है मामला

जिला पंचायत में बीआरजीएफ योजना के संचालन के दौरान भर्ती हुए डाटा इंट्री ऑपरेटर की सेवा समाप्ति के बाद तमाम नियम कायदों को दरकिनार कर विशेष पिछड़ी जनजातीय समूह यानी पीवीटीजी के लिये आरक्षित और जिसमें निर्धारित वर्ग का ही ऑपरेटर कार्यरत था के पद के विरुद्ध सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी की नियुक्ति कर जिला पंचायत के जिम्मेदारों ने अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया है। ऑपरेटर तो अधिकारियों की विशेष कृपा प्राप्त कर दिन-दूनी, रात-चौगुनी तरक्की करते हुए सीईओ का स्टेनो बन बैठा और अब फर्जी तरीके  से नियम विरुद्ध भर्ती करने वालों  की सांसें फूलती नजर आ रही है। यदि मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो एक नहीं बल्कि कई अधिकारियों -कगर्मचारियों की गर्दन नप सकती है।

पावर अनलिमिटेड

नौकरी कैसी है या नियुक्त कैसे हुई इस बात से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है, पद और उसके प्रभाव से फर्क पड़ता है। शहडोल जिला पंचायत में इन दिनों स्टेनो का भौकाल देखने को मिल रहा है। भले ही फर्जी नियुक्ति के आधार पर संविदा डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी मिली हो लेकिन पावर अनलिमिटेड है। बीआरजीएफ योजना खत्म होने के बाद एमडीएम में डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर नियुक्त होने वाले राजकुमार गौतम नामक कर्मचारी ने पहले तो अपने पद नाम में सुधार किया डाटा एंट्री ऑपरेटर को शॉर्ट नेम करते हुए उसे डीईओ पदनाम दिया और अब स्टेनो बनने के बाद पूरी जिला पंचायत पर एक छत्र राज्य कर रहा है। आईएएस /सीईओ के बाद जिला पंचायत में यदि किसी की तूती बोलती है तो वह है स्टेनो की और इस भौकाल का वह भरपूर फायदा उठा रहा है।

जलाल में मालामाल

जिला पंचायत कार्यालय शहडोल जहां अधिकांश कर्मचारी संविदा आधार पर नौकरी कर रहे हैं या विभिन्न केंद्रीय अथवा राज्य योजनाओं के तहत योजनाओं में उनकी पदस्थापना हुई है, के बीच स्टेनो का पद प्राप्त संविदा कर्मचारी का प्रभाव यानी जलाल देखते ही बनता है। भले ही वह डाटा एंट्री ऑपरेटर ही हो उसके सामने उससे कई श्रेणी ऊपर के अधिकारी कर्मचारी यानी परियोजना अधिकारी पीओ, एपीओ, लेखा अधिकारी लेखपाल, जिला समन्वयक जैसे पदधारी भी काफी बौने और निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। सीईओ की विशेष कृपा प्राप्त स्टेनो राजकुमार गौतम ने अपने इसी पद और भौकाल का बेजा लाभ उठाते हुए कई ऐसे कारनामे कर दिए जिनका खुलासा होने और जांच होने पर कई राज बेनकाब हो सकते हैं।

एसी में बैठकर ऐसी-तैसी

जिला पंचायत कार्यालय में यूं तो कई अधिकारी कर्मचारी कार्यरत हैं जिनके अपने कक्ष भी हैं लेकिन सीईओ, एडिशनल सीईओ, अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष के कक्षों के अलावा सिर्फ राजकुमार गौतम यानी स्टेनो का कक्ष ही ऐसा है जहां एसी की सुविधा उपलब्ध है। मध्य प्रदेश शासन के कर्मचारियों के श्रेणी निर्धारण के आधार पर कहीं पांचवें दर्जे में आने वाले संविदा ऑपरेटर को एसी की सुविधा उपलब्ध होना, वह भी जब उससे कहीं बड़े अधिकारी कर्मचारी नॉन एसी कमरों में बैठकर दिन-दिन भर काम करते हों, यह शासन की नीतियों और निर्देशों का सरासर उल्लंघन नहीं तो और क्या है। जानकार सूत्र से मिली खबरों (अपुष्ट ही सही ) के अनुसार स्टेनो बने उक्त संविदा कर्मचारी द्वारा गिफ्ट में मिले पद की धौंस बता कर न सिर्फ सरपंच, सचिव और रोजगार सहायकों के साथ ही जनपद में बैठे अन्य कर्मचारियों अधिकारियों तक को कथित तौर पर ब्लैकमेल कर उनसे अवैध वसूली किया जाता है और आनाकानी करने पर पद से हटवा देने की धमकी देने से भी नहीं चूकता है। चूंकि वह सीईओ का स्टेनो और सबसे करीबी कर्मचारी है इसलिए कार्यालय के और जिले भर से आने वाले अधिकारी, कर्मचारी उसकी हर वैध-अवैध मांग पूरी करने को दिवस नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि जिला पंचायत के ही अधिकारी कर्मचारी यह कहते नहीं थकते की युवराज की जिम्मेदारी निभा रहा एक छोटा कर्मचारी पूरे कार्यालय व जिले के अधिकारी कर्मचारियों की ऐसी तैसी करने से नहीं चूक रहा है।

आंखों का तारा राजकुमार

प्राप्त जानकारी के अनुसार राजकुमार गौतम की नियुक्ति बीआरजीएफ योजना मद से डाटा इंट्री ऑपरेटर के पद पर की गई थी लेकिन नियुक्ति के मात्र चार साल बाद ही बीआरजीएफ योजना बंद हो गई लेकिन इन चार सालों में डाटा इंट्री ऑपरेटर जिला पंचायत में बैठे अधिकारियों की आंखों का तारा बन चुका था। योजना बंद होने के बाद डाटा इंट्री ऑपरेटर की संविदा समाप्ति के साथ ही जिला पंचायत के अधिकारियों ने कथित आंख के तारे को एक भी दिन बेरोजगार नहीं रहने देने का संकल्प लेते हुए उसे कलेक्टर रेट पर नौकरी पर रख लिया। अधिकारियों के इस निर्णय ने ऑपरेटर को तो बचा लिया लेकिन राज्य शासन की नीति और निर्देशों की धज्जियां उड़ाने में एक पल की देरी नहीं की।

कैसे अवैध हुई भर्ती

जानकार सूत्रों की मानें तो जिला पंचायत शहडोल में बीआरजीएफ योजना से हटाए गए ऑपरेटर को जिला पंचायत के अधिकारियों ने मध्यान्ह भोजन योजना के रिक्त हुए डाटा इंट्री ऑपरेटर क पद पर नियुक्त तो कर दिया गया लेकिन शायद इस बात पर गौर नहीं किया गया कि उक्त पद पर विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के उम्मीदवार की भर्ती की गई थी और उक्त वर्ग से ही पुन: भर्ती की जानी चाहिये थी। पुत्र मोह में हस्तिनापुर का सर्वनाश करा देने वाले धृतराष्ट्र की भांति आपरेटर के अंध मोह का शिकार हुए अधिकारियों ने पद की पात्रता और शासकीय नियम निर्देशों को धता बताते हुए नियुक्ति दे दी जबकि तत्संबंधी नोटशीट 31 दिसंबर 2015 की पहली लाइन में ही उल्लेख है कि विशेष पिछड़ी जनजातिके तहत शासन के नियमानुसार शिवकुमार बैगा की नियुक्ति डाटा इंट्री ऑपरेटर पद पर की गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या पूर्व ऑपरेटर के त्यागपत्र देने से शासन की वह नीति ही बदल गई जो वास्तव में भर्ती का आधार थी।

अवैध वसूली कांड में......?

  गौरतलब है कि गत माह किसी फर्जी सीईओ द्वारा जिले के सरपंच-सचिवों से सीईओ जिला पंचायत के नाम पर अवैध वसूली किए जाने का मामला सामने आया था। हालांकि इस मामले के उठने के बाद पुलिस एवं प्रशासन द्वारा की गई किसी भी कार्यवाही का खुलासा तो नहीं हुआ और न ही अब तक आरोपी सामने आए लेकिन जिला पंचायत के गलियारों में गूंजती आवाजों पर यदि ध्यान दिया जाए तो यह आशंका उत्पन्न होती है कि संभव है इस बड़े वसूली कांड में स्टेनो भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हो सकते हैं क्योंकि यह जन चर्चा भी सामने आई थी कि अवैध वसूली का शिकार हुए लोगों के खाते से निकली राशि ऑनलाइन जिला पंचायत के ही कई कर्मचारियों के खातों तक पहुंची थी यदि इस जन चर्चा में थोड़ी भी सच्चाई है तो इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता है कि जिला पंचायत के पिछले दरवाजे वाले मुख्य कर्ताधर्ता यानी स्टेनो की भूमिका भी संदिग्ध हो सकती है।

उक्त संविदा डाटा एंट्री ऑपरेटर को किस मोह वश किस अधिकारी ने स्टेनो जैसी अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी और यह परंपरा क्यों निभाई जा रही है यह तो जिला पंचायत के मुखिया ही जानें, उनके विवेकाधिकार पर सवाल उठाना शायद लाजिमी न हो लेकिन स्टेनो के कथित भौकाल, उसकी गतिविधियों और कार्यालय के भीतर -बाहर उठ रहे आरोपों, आशंकाओं के धुएँ को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। देखना यह है कि जिले व जिला पंचायत के मुखिया कब इस मायावी स्टेनो की खबर लेते हैं।

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