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अल्लाह मेहरबान, तो गधा पहलवान

राजकुमार से युवराज बने आपरेटर के छिपे हैं कई राज

अधिकारियों पर भी हुकूमत चला रहा अवैध नियुक्तिधारी संविदा ऑपरेटर

कार्य संस्कृति को चुस्त-दुरुस्त करने वाले सीईओ से कार्यवाही की दरकार

" अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान वाली चिर-परिचित कहावत शहडोल जिला पंचायत कार्यालय में अक्षरश: चरितार्थ हो रही है जहां कथित तौर पर अवैध तरीके से आरक्षित वर्ग की सीट पर संविदा ऑपरेटर की नौकरी प्राप्त स्टेनो पूरे कार्यालय में राजकुमार नहीं युवराज की तरह राज कर रहा है और कार्यालय के बड़े-बड़े पद धारी अधिकारी भी उसके सामने नतमस्तक नजर आ रहे हैं। आलम यह है कि स्टेनो के रूप में बड़े साहब के सबसे करीबी कर्मचारी होने का रुतबा क्या होता है और अपने से छोटे ही नहीं बड़े कर्मचारी-अधिकारियों को भी कैसे नतमस्तक किया जा सकता है इसकी सीख उक्त ऑपरेटर से ली जा सकती है।"


अनिल द्विवेदी 

शहडोल। जिला पंचायत कार्यालय शहडोल समूचे शहडोल संभाग का एकमात्र ऐसा कार्यालय बन गया है जहां अधिकारियों की नहीं एक अदने से कर्मचारी की तूती बोलती है। मुख्य कार्यपालन अधिकारी कक्ष के ठीक सामने बैठकर स्टेनो के पॉवर का खुलेआम प्रदर्शन करने वाले उक्त कर्मचारी के बारे में बताया जाता है कि उसने  विशेष पिछड़ी जनजाति के लिये आरक्षित पद के विरुद्ध सामान्य वर्ग का होने के बावजूद नियुक्ति प्राप्त की है। तत्कालीन अधिकारी कर्मचारियों की विशेष कृपा से पहले आरक्षित श्रेणी का ऑपरेटर पद और बाद में कर्मचारियों की कम संख्या के चलते स्टेनो का प्रभार पाने वाले संविदा ऑपरेटर राजकुमार गौतम द्वारा अब उन्हीं कर्मचारियों अधिकारियों को डसने का कार्य किया जा रहा है जो पूर्व में उसके हित संरक्षक की भूमिका निभा रहे थे।
यूं हुआ  खेला
प्राप्त जानकारी के अनुसार स्टेनो की भूमिका निभा रहे राजकुमार गौतम की नियुक्ति बीआरजीएफ योजना मद से डाटा इंट्री ऑपरेटर के पद पर की गई थी लेकिन नियुक्ति के मात्र चार साल बाद ही बीआरजीएफ योजना बंद हो गई लेकिन इन चार सालों में डाटा इंट्री ऑपरेटर जिला पंचायत में बैठे अधिकारियों का सबसे प्यारा आपरेटर बन गया। योजना बंद होने के बाद डाटा इंट्री ऑपरेटर की संविदा समाप्ति के साथ ही जिला पंचायत के अधिकारियों ने अपने इस चहेतेे को एक भी दिन बेरोजगार नहीं रहने देने का संकल्प लेते हुए उसे कलेक्टर रेट पर नौकरी पर रख लिया। अधिकारियों के इस निर्णय ने ऑपरेटर को तो बचा लिया लेकिन राज्य शासन की नीति और निर्देशों की धज्जियां उड़ाने में एक पल की देरी नहीं की।
उड़ीं नियमों की धज्जियां
जानकार सूत्रों की मानें तो जिला पंचायत शहडोल में बीआरजीएफ योजना से हटाए गए ऑपरेटर को जिला पंचायत के अधिकारियों ने मध्यान्ह भोजन योजना के रिक्त हुए डाटा इंट्री ऑपरेटर क पद पर नियुक्त तो कर दिया गया लेकिन शायद इस बात पर गौर नहीं किया गया कि उक्त पद पर विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के उम्मीदवार की भर्ती की गई थी और उक्त वर्ग से ही पुन: भर्ती की जानी चाहिये थी। पुत्र मोह में हस्तिनापुर का सर्वनाश करा देने वाले धृतराष्ट्र की भांति आपरेटर के अंध मोह का शिकार हुए अधिकारियों ने पद की पात्रता और शासकीय नियम निर्देशों को धता बताते हुए नियुक्ति दे दी जबकि तत्संबंधी नोटशीट 31 दिसंबर 2015 की पहली लाइन में ही उल्लेख है कि विशेष पिछड़ी जनजातिके तहत शासन के नियमानुसार शिवकुमार बैगा की नियुक्ति डाटा इंट्री ऑपरेटर पद पर की गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या पूर्व ऑपरेटर के त्यागपत्र देने से शासन की वह नीति ही बदल गई जो वास्तव में भर्ती का आधार थी।
बरगलाने का प्रयास
डाटा इंट्री ऑपरेटर की फर्जी भर्ती मामले को उजागर किये जाने के बाद कथित तौर पर नियम विरुद्ध नियुक्ति पाने वाले ऑपरेटर राज कुमार गौतम द्वारा लोगों को यह कह  कर बरगलाने का प्रयास किया जाता रहा है कि विज्ञापन में विशेष पिछड़ी जनजाति के तहत भर्ती का कोई उल्लेख नहीं है और उसकी नियुक्ति वैध है। जब उनसे विज्ञापन की प्रति पूर्ण रूप से दिखाने की बात कही गई तो राजकुमार ने चुप्पी साध ली इसका सीधा अर्थ यही है कि मामला कहीं तो गड़बड़ है।
राजकुमार बना  युवराज
 डाटा इंट्री ऑपरेटर के रूप में कार्य करते हुए राजकुमार ने अधिकारियों को अपने काम-काज से इतना खुश रखा कि वह शायद उसे दत्तक ही मान बैठे और तमाम कर्मचारियों की वरिष्ठता एवं अनुभव को दरकिनार कर राजकुमार को जिला पंचायत का स्टेनो बना दिया। किसी विभाग के स्टेनों की क्या भूमिका होती है और वह कितना जिम्मेदार पद होता है यह शायद बताने की आवश्यकता नहीं है। अब ऐसे में यदि कोई राजकुमार अपने आप को युवराज मान भी बैठे तो क्या बुराई है। युवराज तो युवराज होता है वह किसी का गला काटने जैसा अहित भी कर दे तो कौन देखने या रोकने -टोकने वाला है।
सीईओ अनजान?
सूत्रों की मानें तो स्टेनो की भूमिका निभा रहे ऑपरेटर कौन-कौन से गुल खिला रहे हैं और किस प्रकार अपने ही कार्यालयीन सह कर्मियों की राह में गड्ढे खोदने का कार्य कर रहे हैं शायद इस बात की जानकारी सीईओ जिला पंचायत को नहीं है अन्यथा कार्यालय से लेकर दूरांचल स्थित कार्य क्षेत्रों तक अधिकारी कर्मचारियों को कर्तव्य निष्ठा का पाठ पढ़ाने वाले सीईओ राजकुमार गौतम को ऐसी आजादी देते यह संभव  प्रतीत नहीं होता। दुखद पहलू यह भी है कि कोई कर्मचारी साहब से शिकायत या मनमानी को उजागर करने का  साहस नहीं कर पा रहा है लेकिन इस सच को नकारा नहीं जा सकता है कि उगलत-लीलत पीर घनेरी जैसी स्थिति निर्मित हो चुकी है।

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