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नियम-कानून खतम, पीवीटीजी में भर्ती हो गए गौतम

 

डाटा इंट्री ऑपरेटर से स्टेनो बनने तक जुड़ी हैं कई किंवदंतियां 

कई पूर्व और मौजूदा अधिकारियों का मिला संरक्षण

शहडोल जिला पंचायत में बीआरजीएफ योजना के संचालन के दौरान भर्ती हुए डाटा इंट्री ऑपरेटर की सेवा समाप्ति के बाद तमाम नियम कायदों को दरकिनार कर विशेष पिछड़ी जनजातीय समूह यानी पीवीटीजी के लिये आरक्षित और जिसमें निर्धारित वर्ग का ही ऑपरेटर कार्यरत था के पद के विरुद्ध सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी की नियुक्ति कर जिला पंचायत के जिम्मेदारों ने अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया है। ऑपरेटर तो अधिकारियों की विशेष कृपा प्राप्त कर दिन-दूनी, रात-चौगुनी तरक्की करते हुए साहेब का स्टेनो बन बैठा और अब फर्जी तरीके  से नियम विरुद्ध भर्ती करने वालों  की सांसें फूलती नजर आ रही है। यदि मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो एक नहीं बल्कि कई अधिकारियों -कर्मचारियों की गर्दन नप सकती है।


शहडोल। जिले की सर्वोच्च निर्वाचित संस्था और ग्रामीण विकास की धुरी मानी जाने वाली जिला पंचायत यूं तो हमेशा ही अपनी किसी न किसी कारगुजारी के लिये जन चर्चा का केन्द्र बिन्दु रहा आया है। कभी निर्माण कार्यों में अनियमितता और कमीशनबाजी को लेकर तो कभी सचिवों, ग्रामीण रोजगार सहायकों की नियुक्ति और तबादलों के नाम पर की जाने वाली अवैध वसूली को लेकर लेकिन इस बार मामला ऐसा फंसा है जिसमें विशेष पिछड़ी जनजातियों को शासन द्वारा दिये गए विशेषाधिकार को रौंद कर निहित स्वार्थ या भाई-भतीजावाद  के चलते अथवा आर्थिक समीकरणों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिये जाने की नीति के चलते सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी को नियम विरुद्ध तरीके से जिला पंचायत पर थोप दिया गया परिणाम स्वरूप जिला पंचायत का यह कथित राजकुमार अपने आप को युवराज ही समझ बैठा है।

आंखों का तारा राजकुमार

प्राप्त जानकारी के अनुसार राजकुमार गौतम की नियुक्ति बीआरजीएफ योजना मद से डाटा इंट्री ऑपरेटर के पद पर की गई थी लेकिन नियुक्ति के मात्र चार साल बाद ही बीआरजीएफ योजना बंद हो गई लेकिन इन चार सालों में डाटा इंट्री ऑपरेटर जिला पंचायत में बैठे अधिकारियों की आंखों का तारा बन चुका था। योजना बंद होने के बाद डाटा इंट्री ऑपरेटर की संविदा समाप्ति के साथ ही जिला पंचायत के अधिकारियों ने कथित आंख के तारे को एक भी दिन बेरोजगार नहीं रहने देने का संकल्प लेते हुए उसे कलेक्टर रेट पर नौकरी पर रख लिया। अधिकारियों के इस निर्णय ने ऑपरेटर को तो बचा लिया लेकिन राज्य शासन की नीति और निर्देशों की धज्जियां उड़ाने में एक पल की देरी नहीं की।

कैसे अवैध हुई भर्ती

जानकार सूत्रों की मानें तो जिला पंचायत शहडोल में बीआरजीएफ योजना से हटाए गए ऑपरेटर को जिला पंचायत के अधिकारियों ने मध्यान्ह भोजन योजना के रिक्त हुए डाटा इंट्री ऑपरेटर क पद पर नियुक्त तो कर दिया गया लेकिन शायद इस बात पर गौर नहीं किया गया कि उक्त पद पर विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के उम्मीदवार की भर्ती की गई थी और उक्त वर्ग से ही पुन: भर्ती की जानी चाहिये थी। पुत्र मोह में हस्तिनापुर का सर्वनाश करा देने वाले धृतराष्ट्र की भांति आपरेटर के अंध मोह का शिकार हुए अधिकारियों ने पद की पात्रता और शासकीय नियम निर्देशों को धता बताते हुए नियुक्ति दे दी जबकि तत्संबंधी नोटशीट 31 दिसंबर 2015 की पहली लाइन में ही उल्लेख है कि विशेष पिछड़ी जनजातिके तहत शासन के नियमानुसार शिवकुमार बैगा की नियुक्ति डाटा इंट्री ऑपरेटर पद पर की गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या पूर्व ऑपरेटर के त्यागपत्र देने से शासन की वह नीति ही बदल गई जो वास्तव में भर्ती का आधार थी।

भ्रमित करने का प्रयास

डाटा इंट्री ऑपरेटर की फर्जी भर्ती मामले को उजागर किये जाने के बाद कथित तौर पर नियम विरुद्ध नियुक्ति पाने वाले ऑपरेटर राज कुमार गौतम द्वारा लोगों को यह कह  कर बरगलाने का प्रयास किया जाता रहा है कि विज्ञापन में विशेष पिछड़ी जनजाति के तहत भर्ती का कोई उल्लेख नहीं है और उसकी नियुक्ति वैध है। जब उनसे विज्ञापन की प्रति पूर्ण रूप से दिखाने की बात कही गई तो राजकुमार ने चुप्पी साध ली इसका सीधा अर्थ यही है कि मामला कहीं तो गड़बड़ है।

सेवा के बदले मेवा

पुरानी कहावत है कि सेवा करो तो मेवा मिलता है। यह सर्वमान्य सत्य जिला पंचायत कार्यालय में चरितार्थ होते हुए प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। डाटा इंट्री ऑपरेटर के रूप में कार्य करते हुए राजकुमार ने अधिकारियों को अपने काम-काज से इतना खुश रखा कि वह शायद उसे दत्तक ही मान बैठे और तमाम कर्मचारियों की वरिष्ठता एवं अनुभव को दरकिनार कर राजकुमार को जिला पंचायत का स्टेनो बना दिया। किसी विभाग के स्टेनों की क्या भूमिका होती है और वह कितना जिम्मेदार पद होता है यह शायद बताने की आवश्यकता नहीं है। अब ऐसे में यदि कोई राजकुमार अपने आप को युवराज मान भी बैठे तो क्या बुराई है।


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